कविता · सुर-ताल जुगलबंदी...काव्य

समुद्र मंथन

जीवन दर्पण

Churning of the Ocean

Mirror of Life

Samudra Manthan (Jeevan Darpan) — an original Hindi poem by Gitanjali Saxena.

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सागर की लहरों सा बहता, जीवन का यह सफ़र...
कभी शांत, कभी उग्र, बस बहता निरंतर बेमिसाल,
हवा के झोंकों संग गुनगुनाती, तट से टकराती लहरें,
भँवरों में उलझी पीड़ा में भी, रहे मौन, करें सवाल।
सागर गहराइयों में ही छिपा है रत्नों का अपार भंडार,
जहाँ विष और अमृत दोनों को अपनाया उसने हर बार,
अनजानी लहरें, तट टकराती तरंगें, सुनाए जीवन ज्ञान,
मानों आशाओं से है भरा, कोई अनकहा दर्शन विचार।
निःसंकोच समाये है.. प्राणियों को बिन भेदभाव के,
प्रमाणित करें विशालता, हर मिसाल ही जीवन दर्पण,
उतार-चढ़ाव इसकी प्रकृति, यही जीवन चक्र का सार,
सुबह का सूरज, दे बल उत्सर्जन पर, यही प्रकृति नियम,
नव आशाओं की दस्तक से, तरंगी उमंगें पुनः जाग उठें,
खुशियों भरे रंगों से सजाए जीवन के अधूरे कोरे कैनवस,
दुर्गम पथों पर लक्ष्य हासिल, दे कराए, विवेक पूर्ण चयन,
कुछ यादें लौटें, ना लौटें, फिर भी सिखा जाए अपनापन।
राहें न भटकते, राहगीर का संघर्ष ही, उसका सबसे बड़ा रण,
दुर्लभ पथ हो कठिन सही, पर होता कुछ असंभव कभी नहीं,
नियति के खेल की समझ ही, तो खुद की पहचान दे कराए,
करें प्रार्थना, अठखेलियाँ करती, उन लम्हों की तट वापसी,
जीवन मंथन में प्रयत्नशील रहने में छिपें है जटिल उपाय,
जीवन की गहराइयों से निकला अमृत ही है ‘ईश्वरीय वरदान’
जब जागो तब सवेरा...यही प्रकृति नियम, यही जीवन सत्य।

मूल रचना

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