लेख · नज़राना परदेश से

प्रवासी हिन्दुओं को सौगात एक भव्य मन्दिर

A Grand Temple: A Gift for Hindus Abroad

Pravasi Hinduon Ko Saugat Ek Bhavya Mandir — Gitanjali Saxena’s Hindi article about the Abu Dhabi Hindu temple, originally published on 7 February 2021.

मंदिरों की स्थापना, कई धर्मों में, चाहे वह सनातन, जैन, बौद्ध या सिख धर्म हो, उसका विशेष स्थान है। सभी धर्मों में इस पावन जगह की खास अहमियत होती है, जहां वह अपने गुरु और इष्टदेव के दर्शन कर पाते हैं, जहाँ अपने किसी भी आराध्य देव के प्रति ध्यान केंद्रित कर के चिन्तन किया जा सकता है। दरअसल, यह वह उपासना व आस्था का स्थल होता है, जहां मूर्ति रखकर पूजा अर्चना की जा सकती है। मन्दिर एक देव घर, यानी पूजा का स्थान है, जो हर मनुष्य को भगवान से जुड़ने में मदद करता है। यह स्थान हमें ईश्वर और दिव्य शक्ति के करीब महसूस कराने की एक उत्कृष्ट कलाकृति है। यह वह पावन स्थल है, जो श्रद्धालुओं और ईश्वर के बीच पुल का काम करता है। इस जगह मनुष्य को अपने को पूर्ण समर्पित कर के भगवान की पूजा अर्चना में लीन होने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। यही एक स्थान है, जहां किसी के साथ भेदभाव नहीं होता। इसी छत के नीचे हम सबके जीवन भर का लेखा-जोखा रहता है। ईश्वर अपने आशीर्वाद के रूप में हर एक को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। उसकी भक्ति और मार्गदर्शन से हमें जीवन के उतार चढ़ाव में शक्ति व साहस मिलता है। इसीलिए कहा गया है कि जो कार्य ना हो पा रहा हो, उसकी बागडोर ईश्वर के हाथ में छोड़ देना ही उचित होता है।

हिन्दू धर्म में मूर्ति स्थापना का खास महत्व है। उसकी पूजा, परमात्मा को प्रकाश, फूल और भोजन पानी का प्रेमपूर्ण प्रसाद हिन्दू धर्म में अनिवार्य अनुष्ठान है। धर्म शास्त्रों में जब पूजा की बात की जाती है, तब उसमें देव मूर्ति की परिक्रमा करने के महत्व को भी बताया जाता है। धार्मिक परम्पराओं के अनुसार अपने इष्ट देवी-देवताओं की प्रतिमा की विभिन्न शक्ति के प्रभाव को परिक्रमा से प्राप्त किया जा सकता है। यही नहीं, श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि मंदिर परिक्रमा से उनके जीवन में आये विघ्न और आने वाले संकटों व विपत्तियों का नाश होता है। ईश्वर के प्रति आस्था ही हमें मान्यताओं पर विश्वास करने की ओर बाध्य करती है। माना जाता है कि शंकर जी की प्रतिमा की परिक्रमा से नकारात्मक विचारों का नाश होता है और बुरे सपने दिखने बंद हो जाते हैं। गणेशजी और हनुमानजी की तीन बार परिक्रमा करने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार, इनकी परिक्रमा से सोचे हुए सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो जाते हैं। विष्णु भगवान और उनके स्वरूपों की परिक्रमा करने का भी शास्त्रों में विधान है। कहा जाता है कि इससे हृदय पुष्ट और संकल्प में ऊर्जा का वाहन होता है, जिससे कि सकारात्मक सोच में वृद्धि होती है। इन्हीं सब धार्मिक धारणाओं से बंधे रहने की वजह से ही हमें ईश्वर के नजदीक रहने के अवसर प्राप्त होते हैं। मानव और देवता के बीच, मानव और गुरु के बीच की बातचीत को ही दर्शन कहा जाता है। मंदिर एक सर्वोपरि शांति का स्थान है। इसकी वास्तुकला हमारी कला व संस्कृति की धरोहर को दर्शाती है मंदिर निर्माण का इतिहास चौथी से छठी शताब्दी से है। इस दौरान मंदिर लकड़ी के बनते थे। भारत में अनेक स्थानों में 7वीं शताब्दी तक आर्य संस्कृति ने पत्थरों से मंदिरों का निर्माण प्रारम्भ कर दिया था। मन्दिरों का अस्तित्व और उसकी भव्यता गुप्त राजवंश में देखने को मिलती है। इस दौरान उनके आकार में उल्लेखनीय विस्तार हुआ और उनकी बनावट पर स्थानीय वास्तुकला का प्रभाव भी देखने को मिलता है। उत्तरी भारत में हिन्दू मंदिरों की उत्कृष्टता और उड़ीसा के मंदिरों की वास्तुकला तो विश्वव्यापी प्रसिद्ध है। मंदिरों के निर्माण का इतिहास काल दर काल हिन्दू राजाओं के शासनकाल में बढ़ता रहा। इतिहास में इस दौरान वास्तुकला के दृष्टिकोण में बदलाव भी देखने को मिलते हैं। दक्षिण भारतीय शैली के माध्यम से मंदिरों के निर्माण में वास्तुकला कलाकृति का अद्भुत चित्रण देखने को मिलता है। निःसंदेह हर काल में बने मंदिरों पर उस क्षेत्र के प्रभुत्व व छाप देखने को मिलते हैं। इसी श्रृंखला में इस सदी में कोविड काल में अयोध्या में विशाल मंदिर की सौगात देशवासियों को प्राप्त होगी। वैसे तो दुनिया भर में अनेक प्रसिद्ध और विशाल धार्मिक स्थल बने हुए हैं, जहां बसे अनिवासियों को अपने धर्म के गुरु व देव के नजदीक जाने का अवसर प्राप्त है। विश्वव्यापी स्वामी नारायण हिन्दू धार्मिक संस्था दुनिया भर फैली हुई है। दरअसल, इसी संस्था के द्वारा संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी आबूधाबी में पहला हिन्दू मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। भारतीयों के लिए इस उल्लेखनीय उपलब्धि की मंजूरी प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में उनके यू एई दौरे के दौरान मिली थी। कोविड के चलते निर्माण कार्य में तेजी नहीं पकड़ पाई थी।

किन्तु अब मंदिर का काम दोनों देशों के साझा सहयोग से तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। इसके निर्माण कार्य में भारत के करीबन 3000 शिल्पकार जुटे हुए हैं। पत्थरों को तराश कर देश में ही जयपुर और गुजरात के कारीगर इस कार्य को पूरा करने में लगे हुए हैं। मंदिर का निर्माण 14 एकड़ जमीन पर हो रहा है, जिसे प्राचीन हिन्दू वास्तुकला के अनुसार बनाया जा रहा है। विभिन्न आकारों की हाथ से नक्काशी की गई मूर्तियों में भारत की समृद्ध संस्कृति और इतिहास व प्राचीन कथाओं के दृश्य को सुशोभित करने में दिन रात लगे हुए हैं। कुछ अरबी प्रतीकों को शामिल कर सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की पारंपरिक प्रथाओं पर प्रकाश डालने की ओर भी कार्य किए जा रहे हैं। मंदिर के डिजाइन की विशेषता यह कि लोहे की बजाय गुलाबी बलुआ पत्थर से बनाया जा रहा है। इन पत्थरों पर हिन्दू धर्मग्रंथों और प्राचीन कथाओं का वर्णन किया जा रहा है। माना जाता है कि इन पत्थरों में भीषण गर्मी 50 डिग्री तक झेलने की क्षमता होती है। पत्थरों पर की जा रही शिल्पकला पूर्ण होते ही इन्हें मंदिर में सजाने के लिये संयुक्त अरब अमीरात भेज दिया जाएगा। मंदिर परिसर की विशालता का अनुमान वहां उपलब्ध होने वाली योजनाबद्ध सुविधाओं से आंका जा सकता है। यहाँ यू एई में 3.3 मिलियन भारतीय लोगों के लिए इस मंदिर को प्यार, सहिष्णुता, आपसी पारंपरिक संवाद, बहु-क्रियाशील सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा है। यही नहीं लाखों अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र रहेगा।

इस अभूतपूर्व मंदिर निर्माण से दोनों देशों के रिश्तों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों का नया अध्याय जुड़ गया है। यह एक कला, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों को संरक्षित करने के अलावा, निर्माणाधीन मंदिर मानवता की सेवा को बढ़ावा देने के लिए एक उत्कृष्ट केंद्र के रूप में उभर कर आएगा। मंदिर प्रांगण में साक्षात ईश्वरीय शक्ति और शांति का अनुभव और उसका आत्मिक अहसास ... निःसंदेह हिन्दू अनुयायियों के लिए यह मंदिर अतुल्य तोहफा है।

मूल रचना

मौजूदा संग्रह में देखें · मूल PDF पढ़ें

यह लेख मूल रूप में 7 फरवरी 2021 को प्रकाशित हुआ था। इसमें वर्णित निर्माण की स्थिति उसी समय की है।